Economics class 11 CBSE अध्याय 5


ग्रामीण विकास

(RURAL DEVELOPMENT)


प्रस्तावना (INTRODUCTION)

  • भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ग्रामीण क्षेत्र है।
  • भारत की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में निवास करती है।
  • ग्रामीण जनसंख्या की आजीविका मुख्यतः:
    • कृषि
    • पशुपालन
    • मछलीपालन
      पर निर्भर है।
  • ग्रामीण विकास का उद्देश्य:
    • ग्रामीण लोगों के जीवन स्तर में सुधार
    • गरीबी और बेरोजगारी में कमी
  • आर्थिक विकास के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में:
    • कम आय
    • अविकसित बुनियादी ढाँचा
    • अशिक्षा
      जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं।
  • ग्रामीण विकास संतुलित राष्ट्रीय विकास के लिए अनिवार्य है।

**ग्रामीण विकास क्या है?

(WHAT IS RURAL DEVELOPMENT?)**

ग्रामीण विकास का अर्थ

  • ग्रामीण विकास एक निरंतर प्रक्रिया है।
  • इसका उद्देश्य ग्रामीण लोगों के:
    • आर्थिक
    • सामाजिक
    • सांस्कृतिक
      जीवन स्तर को ऊँचा उठाना है।
  • इसमें शामिल हैं:
    • कृषि विकास
    • रोजगार सृजन
    • शिक्षा और स्वास्थ्य

ग्रामीण विकास के उद्देश्य

  • कृषि उत्पादकता में वृद्धि
  • ग्रामीण रोजगार के अवसर बढ़ाना
  • गरीबी और असमानता को कम करना
  • ग्रामीण बुनियादी ढाँचे का विकास
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण

भारत में ग्रामीण विकास की आवश्यकता

  • जनसंख्या का बड़ा भाग ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है।
  • कृषि पर अत्यधिक निर्भरता।
  • प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्या।
  • ग्रामीण–शहरी असंतुलन।
  • शहरों की ओर पलायन।

ग्रामीण क्षेत्रों की प्रमुख समस्याएँ

  • छोटे और बिखरे हुए भूमि-धारण।
  • मानसून पर निर्भरता।
  • सस्ती ऋण सुविधा का अभाव।
  • विपणन सुविधाओं की कमी।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव।

**ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण और विपणन

(CREDIT AND MARKETING IN RURAL AREAS)**

ग्रामीण ऋण का अर्थ

  • ग्रामीण ऋण से तात्पर्य:
    • किसानों और ग्रामीण परिवारों को दिए गए ऋण से है।
  • ऋण का उपयोग:
    • बीज और उर्वरक खरीदने
    • कृषि यंत्र लेने
    • सिंचाई
    • उपभोग आवश्यकताओं
      के लिए किया जाता है।

ग्रामीण ऋण के स्रोत

1. गैर-संस्थागत स्रोत

  • साहूकार
  • व्यापारी और आढ़ती
  • जमींदार
  • रिश्तेदार

दोष

  • ऊँची ब्याज दर
  • किसानों का शोषण
  • ऋण-जाल की समस्या

2. संस्थागत स्रोत

(क) सहकारी ऋण समितियाँ
  • अल्पकालीन ऋण प्रदान करती हैं।
  • गाँव स्तर पर कार्यरत।
(ख) वाणिज्यिक बैंक
  • राष्ट्रीयकृत बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका।
  • प्राथमिकता क्षेत्र ऋण।
(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRBs)
  • छोटे और सीमांत किसानों के लिए।
(घ) NABARD
  • ग्रामीण ऋण की शीर्ष संस्था।
  • बैंकों को पुनर्वित्त सुविधा।

ग्रामीण ऋण की समस्याएँ

  • ऋण की अपर्याप्त उपलब्धता।
  • ऋण प्राप्ति में देरी।
  • जमानत की आवश्यकता।
  • क्षेत्रीय असमानता।

ग्रामीण ऋण सुधार के उपाय

  • संस्थागत ऋण का विस्तार।
  • किसान क्रेडिट कार्ड योजना।
  • स्वयं सहायता समूह (SHGs)।
  • ऋण प्रक्रिया को सरल बनाना।

**कृषि विपणन प्रणाली

(AGRICULTURAL MARKET SYSTEM)**

कृषि विपणन का अर्थ

  • कृषि विपणन में शामिल है:
    • भंडारण
    • परिवहन
    • ग्रेडिंग
    • मूल्य निर्धारण
    • बिक्री

कृषि विपणन की समस्याएँ

  • भंडारण सुविधाओं का अभाव।
  • किसानों द्वारा मजबूरी में बिक्री।
  • परिवहन की कमी।
  • बिचौलियों का प्रभुत्व।
  • मूल्य जानकारी का अभाव।

कृषि विपणन सुधार के उपाय

1. विनियमित बाजार

  • सरकार द्वारा नियंत्रित मंडियाँ।
  • किसानों को शोषण से सुरक्षा।

2. सहकारी विपणन

  • सामूहिक बिक्री।
  • बेहतर सौदेबाजी शक्ति।

3. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

  • सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मूल्य।
  • मूल्य उतार-चढ़ाव से सुरक्षा।

4. गोदाम और भंडारण

  • फसल की सुरक्षा।
  • बेहतर कीमत की प्रतीक्षा।

**उत्पादक गतिविधियों में विविधीकरण

(DIVERSIFICATION INTO PRODUCTIVE ACTIVITIES)**

विविधीकरण का अर्थ

  • केवल कृषि पर निर्भरता कम करना।
  • अन्य आय-सृजन गतिविधियों को अपनाना।

विविधीकरण की आवश्यकता

  • फसल असफलता का जोखिम घटाना।
  • रोजगार के अवसर बढ़ाना।
  • आय में वृद्धि।
  • मौसमी बेरोजगारी कम करना।

विविधीकरण के प्रकार

1. फसल विविधीकरण

  • विभिन्न प्रकार की फसलें उगाना।

2. सहायक गतिविधियाँ

(क) पशुपालन
  • दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन।
(ख) मत्स्य पालन
  • अंतर्देशीय और समुद्री मछलीपालन।
(ग) बागवानी
  • फल, सब्जियाँ, फूल।

3. गैर-कृषि गतिविधियाँ

  • कुटीर उद्योग
  • हस्तशिल्प
  • परिवहन
  • ग्रामीण पर्यटन

विविधीकरण की चुनौतियाँ

  • पूंजी की कमी।
  • कौशल और प्रशिक्षण का अभाव।
  • बुनियादी ढाँचे की कमी।
  • बाजार तक सीमित पहुँच।

**सतत विकास और जैविक कृषि

(SUSTAINABLE DEVELOPMENT AND ORGANIC FARMING)**

सतत विकास का अर्थ

  • वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य की जरूरतों से समझौता न करना।
  • आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन।

कृषि में सतत विकास की आवश्यकता

  • रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग।
  • भूमि की उर्वरता में कमी।
  • जल प्रदूषण।
  • जैव विविधता का ह्रास।

जैविक कृषि

अर्थ

  • रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बिना कृषि।
  • प्राकृतिक साधनों का उपयोग।

जैविक कृषि के लाभ

  • भूमि की उर्वरता में वृद्धि।
  • पर्यावरण संरक्षण।
  • स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित।
  • दीर्घकालीन स्थायित्व।

जैविक कृषि की सीमाएँ

  • प्रारंभिक वर्षों में कम उत्पादन।
  • अधिक श्रम की आवश्यकता।
  • जागरूकता की कमी।
  • विपणन समस्याएँ।

निष्कर्ष (CONCLUSION)

  • ग्रामीण विकास समावेशी आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य है।
  • ऋण, विपणन, विविधीकरण और सतत कृषि ग्रामीण विकास के प्रमुख स्तंभ हैं।
  • ग्रामीण समस्याओं का समाधान:
    • संस्थागत सुधार
    • निवेश वृद्धि
    • तकनीकी सहायता
      से संभव है।
  • जैविक कृषि भविष्य के लिए आवश्यक है।
  • सशक्त ग्रामीण क्षेत्र ही मजबूत भारत की नींव है।

Leave a Reply

Scroll to Top