Economics class 11 CBSE अध्याय 3


उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण : एक मूल्यांकन

(LIBERALISATION, PRIVATISATION AND GLOBALISATION: AN APPRAISAL)


प्रस्तावना (INTRODUCTION)

  • स्वतंत्रता के बाद भारत ने नियोजित अर्थव्यवस्था को अपनाया।
  • भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था लागू की गई, जिसमें:
    • सार्वजनिक क्षेत्र
    • निजी क्षेत्र
      दोनों की भागीदारी थी।
  • सरकार का आर्थिक गतिविधियों पर अत्यधिक नियंत्रण था।
  • समय के साथ यह व्यवस्था:
    • अल्प विकास दर
    • अक्षमता
    • घाटे
    • विदेशी मुद्रा संकट
      जैसी समस्याओं का कारण बनी।
  • इन समस्याओं से उबरने के लिए 1991 में नई आर्थिक नीति लागू की गई।
  • यह नीति तीन स्तंभों पर आधारित थी:
    • उदारीकरण
    • निजीकरण
    • वैश्वीकरण
  • इन तीनों को सामूहिक रूप से LPG सुधार कहा जाता है।

पृष्ठभूमि (BACKGROUND)

1. 1991 से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था

  • सरकार का उद्योगों पर कड़ा नियंत्रण।
  • लाइसेंस राज प्रणाली लागू थी।
  • उद्योग स्थापित करने के लिए:
    • सरकारी अनुमति
    • कोटा
    • परमिट
      आवश्यक थे।
  • निजी क्षेत्र की भूमिका सीमित थी।
  • सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व था।

2. 1980 के दशक की प्रमुख आर्थिक समस्याएँ

(क) धीमी आर्थिक वृद्धि

  • आर्थिक विकास दर बहुत कम थी।
  • इसे “हिंदू विकास दर” कहा जाता था (लगभग 3–4%)।

(ख) राजकोषीय घाटा

  • सरकारी खर्च, आय से अधिक था।
  • उधारी बढ़ने लगी।
  • सार्वजनिक ऋण में वृद्धि हुई।

(ग) भुगतान संतुलन संकट

  • आयात निर्यात से अधिक था।
  • विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया।
  • 1991 में भारत के पास केवल 2 सप्ताह के आयात के लिए विदेशी मुद्रा थी।

(घ) मुद्रास्फीति

  • वस्तुओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि।
  • गरीब और मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित।

(ङ) सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमता

  • सार्वजनिक उपक्रम:
    • घाटे में चल रहे थे
    • अधिक कर्मचारियों से ग्रस्त थे
    • कुशल प्रबंधन का अभाव था

3. अंतरराष्ट्रीय दबाव

  • भारत ने IMF और विश्व बैंक से ऋण लिया।
  • बदले में उन्होंने:
    • संरचनात्मक सुधार
    • अर्थव्यवस्था खोलने
      की शर्तें रखीं।

4. नई आर्थिक नीति, 1991

  • 1991 में भारत सरकार द्वारा लागू।
  • उद्देश्य:
    • अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धी बनाना
    • बाजार आधारित व्यवस्था को अपनाना
    • वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ना

उदारीकरण (LIBERALISATION)

उदारीकरण का अर्थ

  • उदारीकरण का अर्थ है:
    • सरकारी नियंत्रणों में कमी
    • आर्थिक गतिविधियों में स्वतंत्रता
  • इसका उद्देश्य:
    • दक्षता बढ़ाना
    • प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना

उदारीकरण के उद्देश्य

  • लाइसेंस राज समाप्त करना
  • निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना
  • उत्पादन क्षमता बढ़ाना
  • अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना

उदारीकरण के प्रमुख उपाय

1. औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली की समाप्ति

  • अधिकांश उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त किया गया।
  • अब उद्योग स्थापित करने के लिए:
    • पूर्व सरकारी अनुमति आवश्यक नहीं।
  • केवल कुछ उद्योग जैसे:
    • रक्षा
    • परमाणु ऊर्जा
    • खतरनाक रसायन
      में लाइसेंस आवश्यक है।

2. आयात शुल्क में कमी

  • आयात शुल्क और टैरिफ घटाए गए।
  • विदेशी वस्तुएँ सस्ती हुईं।
  • घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

3. औद्योगिक क्षेत्र का विनियमन हटाना

  • उत्पादन क्षमता पर नियंत्रण समाप्त।
  • उद्योग बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन कर सकते हैं।

4. वित्तीय क्षेत्र में सुधार

  • बैंकों पर सरकारी नियंत्रण घटाया गया।
  • निजी और विदेशी बैंकों की अनुमति।
  • ब्याज दरों का उदारीकरण।
  • पूंजी बाजार में सुधार।

5. कर सुधार

  • कर दरों में कमी।
  • कर प्रणाली को सरल बनाया गया।
  • कर आधार का विस्तार।

उदारीकरण के प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव

  • प्रतिस्पर्धा में वृद्धि
  • गुणवत्ता में सुधार
  • निजी क्षेत्र का विकास
  • उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प

नकारात्मक प्रभाव

  • लघु उद्योग प्रभावित
  • बेरोजगारी में वृद्धि
  • घरेलू उद्योगों पर दबाव

निजीकरण (PRIVATISATION)

निजीकरण का अर्थ

  • सरकारी स्वामित्व में कमी।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी में वृद्धि।

निजीकरण के उद्देश्य

  • दक्षता बढ़ाना
  • घाटे वाले उपक्रमों का बोझ कम करना
  • प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना

निजीकरण के रूप

1. विनिवेश

  • सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री।
  • सरकार आंशिक मालिक बनी रहती है।

2. पूर्ण निजीकरण

  • सम्पूर्ण स्वामित्व निजी क्षेत्र को सौंपना।

3. आउटसोर्सिंग

  • सेवाएँ निजी एजेंसियों को देना।

निजीकरण के लाभ

  • बेहतर प्रबंधन
  • लाभ आधारित दृष्टिकोण
  • तकनीकी सुधार
  • सरकारी बोझ में कमी

निजीकरण की आलोचना

  • सामाजिक कल्याण की उपेक्षा
  • रोजगार असुरक्षा
  • आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण
  • क्षेत्रीय असमानता

वैश्वीकरण (GLOBALISATION)

वैश्वीकरण का अर्थ

  • भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से एकीकरण।
  • वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और तकनीक का मुक्त प्रवाह।

वैश्वीकरण के उद्देश्य

  • विदेशी निवेश को बढ़ावा
  • निर्यात में वृद्धि
  • नई तकनीक प्राप्त करना

वैश्वीकरण के उपाय

1. व्यापार बाधाओं में कमी

  • टैरिफ और कोटा में कटौती।

2. विदेशी निवेश को प्रोत्साहन

  • FDI की अनुमति।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवेश।

3. विदेशी मुद्रा सुधार

  • बाजार आधारित विनिमय दर।
  • विदेशी मुद्रा की आसान उपलब्धता।

4. WTO की भूमिका

  • भारत WTO का सदस्य बना।
  • वैश्विक व्यापार नियमों को अपनाया।

वैश्वीकरण के प्रभाव

सकारात्मक

  • विदेशी निवेश में वृद्धि
  • तकनीकी विकास
  • सेवा क्षेत्र का विस्तार
  • उपभोक्ताओं को लाभ

नकारात्मक

  • घरेलू उद्योगों को खतरा
  • सांस्कृतिक प्रभाव
  • पर्यावरणीय समस्याएँ
  • असमान विकास

सुधारों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था : एक मूल्यांकन

1. सकल घरेलू उत्पाद (GDP)

  • आर्थिक विकास दर में सुधार।
  • भारत तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना।

2. कृषि क्षेत्र

  • विकास दर कम रही।
  • सरकारी निवेश में कमी।
  • किसानों की समस्याएँ बढ़ीं।

3. औद्योगिक क्षेत्र

  • प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
  • कुछ उद्योगों का विकास तेज़ रहा।

4. सेवा क्षेत्र

  • सबसे तेज़ी से विकसित।
  • IT, बैंकिंग, टेलीकॉम का विस्तार।

5. रोजगार

  • रोजगार सृजन अपेक्षा से कम।
  • असंगठित क्षेत्र में वृद्धि।

6. सामाजिक प्रभाव

सकारात्मक

  • गरीबी में कमी
  • मध्यम वर्ग का विस्तार

नकारात्मक

  • आय असमानता
  • क्षेत्रीय असंतुलन

निष्कर्ष (CONCLUSION)

  • LPG सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी।
  • भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
  • विकास दर में वृद्धि हुई, लेकिन:
    • समानता
    • सामाजिक न्याय
      की चुनौतियाँ बनी रहीं।
  • सुधारों को समावेशी और संतुलित बनाना आवश्यक है।
  • आर्थिक विकास के साथ-साथ:
    • रोजगार
    • कृषि
    • गरीबों के कल्याण
      पर ध्यान देना ज़रूरी है।

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