उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण : एक मूल्यांकन
(LIBERALISATION, PRIVATISATION AND GLOBALISATION: AN APPRAISAL)
प्रस्तावना (INTRODUCTION)
- स्वतंत्रता के बाद भारत ने नियोजित अर्थव्यवस्था को अपनाया।
- भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था लागू की गई, जिसमें:
- सार्वजनिक क्षेत्र
- निजी क्षेत्र
दोनों की भागीदारी थी।
- सरकार का आर्थिक गतिविधियों पर अत्यधिक नियंत्रण था।
- समय के साथ यह व्यवस्था:
- अल्प विकास दर
- अक्षमता
- घाटे
- विदेशी मुद्रा संकट
जैसी समस्याओं का कारण बनी।
- इन समस्याओं से उबरने के लिए 1991 में नई आर्थिक नीति लागू की गई।
- यह नीति तीन स्तंभों पर आधारित थी:
- उदारीकरण
- निजीकरण
- वैश्वीकरण
- इन तीनों को सामूहिक रूप से LPG सुधार कहा जाता है।
पृष्ठभूमि (BACKGROUND)
1. 1991 से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था
- सरकार का उद्योगों पर कड़ा नियंत्रण।
- लाइसेंस राज प्रणाली लागू थी।
- उद्योग स्थापित करने के लिए:
- सरकारी अनुमति
- कोटा
- परमिट
आवश्यक थे।
- निजी क्षेत्र की भूमिका सीमित थी।
- सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व था।
2. 1980 के दशक की प्रमुख आर्थिक समस्याएँ
(क) धीमी आर्थिक वृद्धि
- आर्थिक विकास दर बहुत कम थी।
- इसे “हिंदू विकास दर” कहा जाता था (लगभग 3–4%)।
(ख) राजकोषीय घाटा
- सरकारी खर्च, आय से अधिक था।
- उधारी बढ़ने लगी।
- सार्वजनिक ऋण में वृद्धि हुई।
(ग) भुगतान संतुलन संकट
- आयात निर्यात से अधिक था।
- विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया।
- 1991 में भारत के पास केवल 2 सप्ताह के आयात के लिए विदेशी मुद्रा थी।
(घ) मुद्रास्फीति
- वस्तुओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि।
- गरीब और मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित।
(ङ) सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमता
- सार्वजनिक उपक्रम:
- घाटे में चल रहे थे
- अधिक कर्मचारियों से ग्रस्त थे
- कुशल प्रबंधन का अभाव था
3. अंतरराष्ट्रीय दबाव
- भारत ने IMF और विश्व बैंक से ऋण लिया।
- बदले में उन्होंने:
- संरचनात्मक सुधार
- अर्थव्यवस्था खोलने
की शर्तें रखीं।
4. नई आर्थिक नीति, 1991
- 1991 में भारत सरकार द्वारा लागू।
- उद्देश्य:
- अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धी बनाना
- बाजार आधारित व्यवस्था को अपनाना
- वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ना
उदारीकरण (LIBERALISATION)
उदारीकरण का अर्थ
- उदारीकरण का अर्थ है:
- सरकारी नियंत्रणों में कमी
- आर्थिक गतिविधियों में स्वतंत्रता
- इसका उद्देश्य:
- दक्षता बढ़ाना
- प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना
उदारीकरण के उद्देश्य
- लाइसेंस राज समाप्त करना
- निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना
- उत्पादन क्षमता बढ़ाना
- अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना
उदारीकरण के प्रमुख उपाय
1. औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली की समाप्ति
- अधिकांश उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त किया गया।
- अब उद्योग स्थापित करने के लिए:
- पूर्व सरकारी अनुमति आवश्यक नहीं।
- केवल कुछ उद्योग जैसे:
- रक्षा
- परमाणु ऊर्जा
- खतरनाक रसायन
में लाइसेंस आवश्यक है।
2. आयात शुल्क में कमी
- आयात शुल्क और टैरिफ घटाए गए।
- विदेशी वस्तुएँ सस्ती हुईं।
- घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
3. औद्योगिक क्षेत्र का विनियमन हटाना
- उत्पादन क्षमता पर नियंत्रण समाप्त।
- उद्योग बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन कर सकते हैं।
4. वित्तीय क्षेत्र में सुधार
- बैंकों पर सरकारी नियंत्रण घटाया गया।
- निजी और विदेशी बैंकों की अनुमति।
- ब्याज दरों का उदारीकरण।
- पूंजी बाजार में सुधार।
5. कर सुधार
- कर दरों में कमी।
- कर प्रणाली को सरल बनाया गया।
- कर आधार का विस्तार।
उदारीकरण के प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव
- प्रतिस्पर्धा में वृद्धि
- गुणवत्ता में सुधार
- निजी क्षेत्र का विकास
- उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प
नकारात्मक प्रभाव
- लघु उद्योग प्रभावित
- बेरोजगारी में वृद्धि
- घरेलू उद्योगों पर दबाव
निजीकरण (PRIVATISATION)
निजीकरण का अर्थ
- सरकारी स्वामित्व में कमी।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी में वृद्धि।
निजीकरण के उद्देश्य
- दक्षता बढ़ाना
- घाटे वाले उपक्रमों का बोझ कम करना
- प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना
निजीकरण के रूप
1. विनिवेश
- सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री।
- सरकार आंशिक मालिक बनी रहती है।
2. पूर्ण निजीकरण
- सम्पूर्ण स्वामित्व निजी क्षेत्र को सौंपना।
3. आउटसोर्सिंग
- सेवाएँ निजी एजेंसियों को देना।
निजीकरण के लाभ
- बेहतर प्रबंधन
- लाभ आधारित दृष्टिकोण
- तकनीकी सुधार
- सरकारी बोझ में कमी
निजीकरण की आलोचना
- सामाजिक कल्याण की उपेक्षा
- रोजगार असुरक्षा
- आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण
- क्षेत्रीय असमानता
वैश्वीकरण (GLOBALISATION)
वैश्वीकरण का अर्थ
- भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से एकीकरण।
- वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और तकनीक का मुक्त प्रवाह।
वैश्वीकरण के उद्देश्य
- विदेशी निवेश को बढ़ावा
- निर्यात में वृद्धि
- नई तकनीक प्राप्त करना
वैश्वीकरण के उपाय
1. व्यापार बाधाओं में कमी
- टैरिफ और कोटा में कटौती।
2. विदेशी निवेश को प्रोत्साहन
- FDI की अनुमति।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवेश।
3. विदेशी मुद्रा सुधार
- बाजार आधारित विनिमय दर।
- विदेशी मुद्रा की आसान उपलब्धता।
4. WTO की भूमिका
- भारत WTO का सदस्य बना।
- वैश्विक व्यापार नियमों को अपनाया।
वैश्वीकरण के प्रभाव
सकारात्मक
- विदेशी निवेश में वृद्धि
- तकनीकी विकास
- सेवा क्षेत्र का विस्तार
- उपभोक्ताओं को लाभ
नकारात्मक
- घरेलू उद्योगों को खतरा
- सांस्कृतिक प्रभाव
- पर्यावरणीय समस्याएँ
- असमान विकास
सुधारों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था : एक मूल्यांकन
1. सकल घरेलू उत्पाद (GDP)
- आर्थिक विकास दर में सुधार।
- भारत तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना।
2. कृषि क्षेत्र
- विकास दर कम रही।
- सरकारी निवेश में कमी।
- किसानों की समस्याएँ बढ़ीं।
3. औद्योगिक क्षेत्र
- प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
- कुछ उद्योगों का विकास तेज़ रहा।
4. सेवा क्षेत्र
- सबसे तेज़ी से विकसित।
- IT, बैंकिंग, टेलीकॉम का विस्तार।
5. रोजगार
- रोजगार सृजन अपेक्षा से कम।
- असंगठित क्षेत्र में वृद्धि।
6. सामाजिक प्रभाव
सकारात्मक
- गरीबी में कमी
- मध्यम वर्ग का विस्तार
नकारात्मक
- आय असमानता
- क्षेत्रीय असंतुलन
निष्कर्ष (CONCLUSION)
- LPG सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी।
- भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
- विकास दर में वृद्धि हुई, लेकिन:
- समानता
- सामाजिक न्याय
की चुनौतियाँ बनी रहीं।
- सुधारों को समावेशी और संतुलित बनाना आवश्यक है।
- आर्थिक विकास के साथ-साथ:
- रोजगार
- कृषि
- गरीबों के कल्याण
पर ध्यान देना ज़रूरी है।
