विकास नीतियाँ और अनुभव (1947–90)
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था
परिचय (INTRODUCTION)
- भारत लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहा।
- इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को इस प्रकार विकसित किया गया कि वह ब्रिटेन के हितों की पूर्ति करे।
- अंग्रेजों की नीतियों ने भारत की पारंपरिक अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया।
- 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत की स्थिति:
- अत्यधिक गरीबी
- पिछड़ापन
- आर्थिक असमानता
- कृषि पर अत्यधिक निर्भरता
- देश में औद्योगिक विकास बहुत सीमित था।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का अभाव था।
- इस अध्याय का उद्देश्य है:
- स्वतंत्रता के समय भारत की आर्थिक स्थिति को समझना
- उन समस्याओं को जानना जो भारत को विरासत में मिलीं
- यही कारण था कि स्वतंत्र भारत ने योजनाबद्ध आर्थिक विकास को अपनाया।
औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत आर्थिक विकास का निम्न स्तर
(LOW LEVEL OF ECONOMIC DEVELOPMENT UNDER COLONIAL RULE)
- ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का आर्थिक विकास बहुत धीमा था।
- विकास का लाभ भारतीयों को नहीं बल्कि ब्रिटेन को मिला।
- अंग्रेजों की नीतियों का मुख्य उद्देश्य था:
- भारत से कच्चा माल प्राप्त करना
- भारत में ब्रिटिश निर्मित वस्तुएँ बेचना
- भारत को केवल एक:
- कच्चे माल का उत्पादक
- तैयार माल का उपभोक्ता बना दिया गया।
- भारत की आय का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
- इसे धन की निकासी (Drain of Wealth) कहा जाता है।
- सरकार ने शिक्षा, उद्योग और स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च किया।
- परिणामस्वरूप:
- प्रति व्यक्ति आय बहुत कम रही
- गरीबी व्यापक रूप से फैली
- आर्थिक आत्मनिर्भरता का पूर्ण अभाव था।
- भारत एक निर्भर और शोषित अर्थव्यवस्था बन गया।
कृषि क्षेत्र (AGRICULTURAL SECTOR)
कृषि का महत्व
- कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी।
- लगभग 70–75% जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी।
- इसके बावजूद कृषि क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा हुआ था।
भूमि राजस्व प्रणालियाँ
अंग्रेजों ने तीन प्रमुख भूमि व्यवस्था प्रणालियाँ लागू कीं:
- जमींदारी प्रणाली
- रैयतवाड़ी प्रणाली
- महालवाड़ी प्रणाली
जमींदारी प्रणाली
- जमींदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया।
- किसान केवल किरायेदार बनकर रह गए।
- जमींदार किसानों से अत्यधिक लगान वसूलते थे।
- भूमि सुधार में उनकी कोई रुचि नहीं थी।
- किसानों का शोषण हुआ और वे कर्ज में डूबते गए।
कृषि की समस्याएँ
- निम्न उत्पादकता
- पुराने औजारों का प्रयोग
- आधुनिक तकनीक का अभाव
- मानसून पर निर्भरता
- सिंचाई सुविधाओं की कमी
- भूमि का विखंडन
- किसानों की ऋणग्रस्तता
- बार-बार अकाल
- व्यावसायीकरण
- नील, कपास, चाय जैसी फसलों को बढ़ावा
- खाद्यान्न उत्पादन की उपेक्षा
- कृषि अनुसंधान और निवेश का अभाव
प्रभाव
- ग्रामीण गरीबी बढ़ी।
- कृषि उद्योगों को कच्चा माल देने में असफल रही।
- खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ।
औद्योगिक क्षेत्र (INDUSTRIAL SECTOR)
पारंपरिक उद्योगों का पतन
- भारत में हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग विकसित थे।
- अंग्रेजों ने इन उद्योगों को नष्ट कर दिया।
- ब्रिटेन से सस्ते मशीन-निर्मित माल का आयात हुआ।
- भारतीय कारीगर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए।
- इस प्रक्रिया को औद्योगिक अवनति (Deindustrialisation) कहा जाता है।
आधुनिक उद्योगों का विकास
- कुछ आधुनिक उद्योग विकसित किए गए:
- कपड़ा उद्योग
- जूट उद्योग
- लौह एवं इस्पात उद्योग
- ये उद्योग ब्रिटिश हितों के लिए थे।
- औद्योगिक विकास:
- सीमित
- असंतुलित
- क्षेत्रीय था
पूंजीगत वस्तु उद्योगों का अभाव
- भारी उद्योगों का विकास नहीं हुआ।
- मशीनरी और उपकरण ब्रिटेन से आयात किए जाते थे।
- आत्मनिर्भर औद्योगिक विकास संभव नहीं था।
अन्य समस्याएँ
- कुशल श्रमिकों की कमी
- तकनीकी शिक्षा का अभाव
- सरकारी संरक्षण का अभाव
- उद्योग कुछ ही शहरों तक सीमित रहे:
- मुंबई
- कोलकाता
- चेन्नई
विदेशी व्यापार (FOREIGN TRADE)
विदेशी व्यापार की प्रकृति
- विदेशी व्यापार पर अंग्रेजों का पूर्ण नियंत्रण था।
- भारत निर्यात करता था:
- कच्चा माल
- कृषि उत्पाद
- भारत आयात करता था:
- तैयार वस्तुएँ
- मशीनें
व्यापार संरचना
- निर्यात अधिशेष (Export Surplus) था।
- परंतु लाभ भारत को नहीं मिला।
- निर्यात से प्राप्त धन का उपयोग:
- ब्रिटिश प्रशासन
- युद्ध खर्च
- होम चार्जेज में किया गया।
व्यापारिक साझेदार
- ब्रिटेन प्रमुख व्यापारिक साझेदार था।
- व्यापार का विविधीकरण नहीं था।
प्रभाव
- घरेलू उद्योग कमजोर हुए।
- आर्थिक शोषण बढ़ा।
- भारत की निर्भरता बढ़ी।
जनसांख्यिकीय स्थिति (DEMOGRAPHIC CONDITION)
जनसंख्या
- जनसंख्या बहुत अधिक थी।
- वृद्धि दर कम लेकिन दबाव अधिक था।
साक्षरता
- साक्षरता दर लगभग 16% थी।
- महिला साक्षरता अत्यंत कम थी।
- शिक्षा केवल कुछ वर्गों तक सीमित थी।
स्वास्थ्य
- खराब स्वास्थ्य सुविधाएँ
- बीमारियाँ:
- मलेरिया
- हैजा
- प्लेग
- जीवन प्रत्याशा लगभग 32 वर्ष थी।
- शिशु मृत्यु दर अधिक थी।
गरीबी
- व्यापक गरीबी व्याप्त थी।
- जीवन स्तर अत्यंत निम्न था।
व्यावसायिक संरचना (OCCUPATIONAL STRUCTURE)
- कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक क्षेत्र में था।
- वितरण:
- प्राथमिक क्षेत्र – 75%
- द्वितीयक क्षेत्र – 10%
- तृतीयक क्षेत्र – 15%
- इससे औद्योगिक पिछड़ापन स्पष्ट होता है।
- छिपी हुई बेरोजगारी व्यापक थी।
- रोजगार के सीमित अवसर थे।
अवसंरचना (INFRASTRUCTURE)
परिवहन
- सड़कें अविकसित थीं।
- रेलवे का विकास:
- कच्चा माल ढोने
- सैन्य नियंत्रण के लिए किया गया।
संचार
- डाक और तार सेवाएँ थीं।
- प्रशासनिक सुविधा हेतु उपयोग किया गया।
ऊर्जा
- बिजली उत्पादन बहुत कम था।
- ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली नहीं थी।
जल और स्वच्छता
- स्वच्छ पेयजल की कमी
- खराब स्वच्छता व्यवस्था
उद्देश्य
- अवसंरचना का विकास ब्रिटिश हितों के लिए था।
- भारतीय आर्थिक विकास इसका लक्ष्य नहीं था।
निष्कर्ष (CONCLUSION)
- स्वतंत्रता के समय भारत को एक:
- पिछड़ी
- गरीब
- अशिक्षित अर्थव्यवस्था विरासत में मिली।
- औपनिवेशिक शासन ने भारत की संपत्ति का शोषण किया।
- कृषि और उद्योग दोनों पिछड़े हुए थे।
- विदेशी व्यापार शोषणकारी था।
- अवसंरचना विकास असंतुलित था।
- रोजगार संरचना अस्वस्थ थी।
- इन परिस्थितियों ने आर्थिक योजना की आवश्यकता को जन्म दिया।
- स्वतंत्र भारत ने अपनाया:
- पंचवर्षीय योजनाएँ
- सार्वजनिक क्षेत्र
- औद्योगीकरण
- इस अध्याय से भारत की विकास नीति की पृष्ठभूमि समझ में आती है।
