**अध्याय 6 – भूपृष्ठ आकृतियाँ और उनका विकास
1. प्रस्तावना (Introduction)
- पृथ्वी की सतह पर दिखाई देने वाली सभी आकृतियाँ स्थायी नहीं हैं, वे समय के साथ बदलती रहती हैं।
- आकृतियों का निर्माण अंतर्जात क्रियाओं (जैसे भूगर्भीय गतियाँ) तथा बहिर्जात क्रियाओं (जैसे जल, हिमानी, हवा, तरंगें) से होता है।
- नदियाँ, हिमनद, हवा, तरंगें तथा भूमिगत जल प्रमुख भू-आकृतिजनक (geomorphic) अभिकर्ता हैं।
- प्रत्येक अभिकर्ता अपने विशिष्ट तरीकों—कटाव, परिवहन और निक्षेपण—से भूपृष्ठ आकृतियों का निर्माण करता है।
- किसी क्षेत्र की जलवायु, चट्टान की प्रकृति, ढाल एवं समय की अवधि के अनुसार भूमि-आकृतियाँ विकसित होती हैं।
2. प्रवाही जल (Running Water / River Action)
नदी एक शक्तिशाली भू-आकृतिजनक अभिकर्ता है। यह कटाव, परिवहन और निक्षेपण करती है।
2.1 नदी का कार्य
- कटाव (Erosion) – ऊर्ध्वाधर व पार्श्व कटाव।
- परिवहन (Transportation) – नदी द्वारा रेत, गाद, गिट्टी, कंकड़ आदि का वहन।
- निक्षेपण (Deposition) – वेग घटने पर सामग्री का जमाव।
2.2 नदी के विकास के चरण (Fluvial Cycle / Stages)
विलियम डेविस के अनुसार नदी तीन अवस्थाओं से गुजरती है:
2.3 युवावस्था (Youth Stage)
विशेषताएँ:
- तीव्र ढाल
- ऊर्ध्वाधर कटाव अधिक
- V-आकार की संकरी घाटियाँ
- प्रपात (Waterfalls) एवं तीव्र धाराएँ (Rapids)
मुख्य आकृतियाँ:
- V-आकार की घाटियाँ
- गॉर्ज एवं कैन्यन
- जलप्रपात एवं रैपिड्स
2.4 प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)
विशेषताएँ:
- ढाल कम
- पार्श्व कटाव बढ़ता है
- घाटियाँ चौड़ी होती हैं
मुख्य आकृतियाँ:
- चौड़ी घाटियाँ
- प्रारंभिक मियान्डर (Meanders)
- नदी-सीढ़ियाँ (River terraces) का प्रारूप
2.5 वृद्धावस्था (Old Stage)
विशेषताएँ:
- वेग अत्यंत कम
- निक्षेपण अधिक
- अत्यधिक मियान्डरिंग
मुख्य आकृतियाँ:
- बाढ़ मैदान (Floodplains)
- प्राकृतिक तटबंध (Natural levees)
- ओक्स-बो झीलें
- डेल्टा
3. विस्तृत नदी-जनित आकृतियाँ
3.1 घाटियाँ (Valleys)
- नदी द्वारा कटाव से बनने वाले लंबे अवनत क्षेत्र।
- प्रकार:
- V-आकार (युवावस्था)
- चौड़ी घाटियाँ (प्रौढ़)
- विशाल बाढ़ मैदान (वृद्ध)
3.2 अवगहीत/गहरी मियान्डर (Incised or Entrenched Meanders)
- जब भूमि का तीव्र उत्थान होता है या नदी का पुनर्जीवन होता है, तब नदी गहराई में कटाव करती है।
- दो प्रकार:
- एंट्रेंच्ड मियान्डर – सममित, गहरे कटे हुए
- इंसाइज़्ड मियान्डर – असममित
3.3 नदी-सीढ़ियाँ (River Terraces)
- घाटी की दीवारों पर सीढ़ीनुमा मैदान।
- जलवायु परिवर्तन, भूमि उत्थान या जल-स्तर में बदलाव से बनते हैं।
- प्रकार: युग्मित (Paired), अयुग्मित (Unpaired), भराव सीढ़ियाँ (Fill Terraces)
3.4 बाढ़ मैदान (Floodplains)
- बारम्बार बाढ़ से बने विस्तृत समतल मैदान।
- जलोढ़ परतों से निर्मित।
3.5 प्राकृतिक तटबंध (Natural Levees)
- बाढ़ के समय भारी निक्षेप से दोनों तटों पर बने ऊँचे किनारे।
3.6 पॉइंट बार (Point Bars)
- मियान्डर के अंदरूनी भाग में बनने वाले रेत और गाद के जमाव।
3.7 मियान्डर (Meanders)
- नदी के प्रवाह में बनने वाले वक्र।
- बाहरी किनारा – कट बैंक
- भीतरी किनारा – स्लिप-ऑफ स्लोप
4. कार्स्ट स्थलरूप (Karst Topography – Groundwater Action)
चूना-पत्थर क्षेत्रों में भूमिगत जल द्वारा घुलन क्रिया से बनाए गए स्थलरूप।
4.1 पूल (Pools / Solution Pits)
- घुलन क्रिया से बनी छोटी-बड़ी गोलाकार अवनतियाँ।
4.2 सिंकहोल या डोलाइन (Sinkholes / Dolines)
- छत गिरने या घुलन क्रिया से बनी गोलाकार गढ्ढे।
4.3 लैपियés (Lapies)
- चूना-पत्थर की सतह पर बने खांचे, खड्डे और धारियाँ।
4.4 लाइमस्टोन पावेमेंट (Limestone Pavements)
- समतल चट्टान सतह, जिसमें दरारें एवं जोड़ों में घुलन क्रिया से कटाव स्पष्ट।
4.5 गुफाएँ (Caves)
- भूमिगत जल द्वारा चट्टानों के घुलने से बनी सुरंगें व कक्ष।
गुफा विशेषताएँ:
- स्टैलेक्टाइट – छत से नीचे की ओर बढ़ती संरचना
- स्टैलेग्माइट – भूमि से ऊपर की ओर बढ़ती संरचना
- स्तंभ (Pillar) – दोनों के जुड़ने पर
5. हिमनद (Glaciers)
हिमनद बर्फ की विशाल गतिमान नदियाँ हैं। इनसे कटाव, परिवहन व निक्षेपण होता है।
5.1 हिमनदीय कटाव आकृतियाँ
(i) सर्क (Cirques)
- कटोरीनुमा अवनति जहाँ हिमनद की उत्पत्ति होती है।
(ii) U-आकार की घाटियाँ
- चौड़ी व सपाट तल वाली घाटियाँ।
(iii) हैंगिंग वैली
- मुख्य घाटी से ऊपर लटकी सहायक घाटियाँ।
(iv) हॉर्न (Horns)
- तीन या अधिक सर्कों की कटाव क्रिया से बनी नुकीली चोटियाँ।
(v) आरैट / आरीदार रिज (Serrated Ridges)
- दो सर्कों के बीच बनी धारदार संकरी पर्वत धार।
5.2 हिमनदीय निक्षेप आकृतियाँ
(i) मोरेन
- अवसाद का जमाव।
- प्रकार: लैटरल, मेडियल, टर्मिनल, ग्राउंड मोरेन।
(ii) ड्रमलिन
- लंबोतरी पहाड़ियाँ—बर्फ के नीचे निक्षेपित सामग्री से बनीं।
(iii) आउटवॉश प्लेन
- पिघलती बर्फ के सामने फैली निक्षेपित मैदान।
6. तरंगें व समुद्री धाराएँ (Waves and Currents)
6.1 तरंग कटाव स्थलरूप
(i) समुद्री चट्टानें/क्लिफ्स (Cliffs)
- तरंग कटाव से ऊर्ध्वाधर दीवारें।
(ii) समुद्री गुफाएँ (Sea Caves)
- कटाव से बनी तटीय गुफाएँ।
(iii) समुद्री मेहराब (Sea Arches)
- गुफाओं के मिल जाने पर।
(iv) स्टैक्स
- मेहराब टूटने पर बची खड़ी चट्टानें।
(v) तरंग क्षरित पटल (Wave-cut Platforms)
- कटाव से बनी समतल सपाट सतह।
6.2 समुद्री निक्षेप स्थलरूप
(i) समुद्र तट (Beaches)
- रेत, कंकड़, गाद का जमाव।
(ii) स्पिट
- समुद्र में आगे निकली संकरी रेत पट्टी।
(iii) बार
- किनारे के समानांतर रेत/गाद की लकीरें।
(iv) लैगून
- बार से घिरा उथला जलाशय।
(v) टोम्बोलो
- रेत की पट्टी जो द्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ती है।
7. पवनजनित स्थलरूप (Wind / Aeolian Landforms)
7.1 कटाव स्थलरूप
(i) डिफ्लेशन बेसिन / ब्लोआउट्स
- हवा द्वारा ढीली सामग्री हटाने से बनी अवनतियाँ।
(ii) यार्डैंग
- लंबी खांचे व धारियाँ—कटाव से बनी आकृति।
(iii) मशरूम चट्टानें (Mushroom Rocks)
- नीचे अधिक कटाव, ऊपर कम—मशरूम जैसी आकृति।
7.2 निक्षेप स्थलरूप
(i) रेत के टीले (Sand Dunes)
- हवा द्वारा उड़ाई रेत के जमाव से बनी पहाड़ियाँ।
प्रकार:
- बार्खान
- अनुप्रस्थ टीले
- अनुदैर्ध्य टीले
- तारा-आकार टीले
- परवलयिक टीले
(ii) लोएस (Loess)
- महीन कणों का दूर-दूर तक व्यापक निक्षेप।
8. प्लाया (Playas)
- मरुस्थलों में स्थित सूखी झीलें।
- बारिश या अस्थायी जलधाराओं के जल के वाष्पीकरण से लवणीय मैदान का निर्माण।
- इन्हें साल्ट पैन भी कहते हैं।
9. सार—मुख्य अभिकर्ता और स्थलरूप
| अभिकर्ता | कटाव स्थलरूप | निक्षेप स्थलरूप |
|---|---|---|
| नदी | V-घाटी, गॉर्ज | बाढ़ मैदान, डेल्टा |
| हिमनद | सर्क, U-घाटी | मोरेन, ड्रमलिन |
| हवा | यार्डैंग | रेत के टीले, लोएस |
| तरंगें | मेहराब, चट्टानें | बीच, स्पिट |
| भूमिगत जल | सिंकहोल, गुफाएँ | स्टैलेग्माइट, स्टैलेक्टाइट |
10. निष्कर्ष (Conclusion)
- भूपृष्ठ आकृतियाँ निरंतर परिवर्तित होती रहती हैं।
- नदियाँ, हिमनद, हवा, तरंगें तथा भूमिगत जल—प्रत्येक अपने विशिष्ट तरीकों से स्थलरूप बनाते और बदलते हैं।
- कटाव भूमि को काटता है, जबकि निक्षेपण नई आकृतियाँ बनाता है।
- इन प्रक्रियाओं का अध्ययन—
- प्राकृतिक जोखिमों की भविष्यवाणी,
- संसाधन प्रबंधन,
- भूमि उपयोग योजना,
- पर्यावरण संरक्षण में अत्यंत उपयोगी है।
- लाखों वर्षों में पृथ्वी की स्थलाकृतियाँ विकसित होकर आज के रूप में दिखाई देती हैं।
