Economics class 11 CBSE अध्याय 1


विकास नीतियाँ और अनुभव (1947–90)

स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था


परिचय (INTRODUCTION)

  1. भारत लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहा।
  2. इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को इस प्रकार विकसित किया गया कि वह ब्रिटेन के हितों की पूर्ति करे।
  3. अंग्रेजों की नीतियों ने भारत की पारंपरिक अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया।
  4. 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत की स्थिति:
    • अत्यधिक गरीबी
    • पिछड़ापन
    • आर्थिक असमानता
    • कृषि पर अत्यधिक निर्भरता
  5. देश में औद्योगिक विकास बहुत सीमित था।
  6. शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का अभाव था।
  7. इस अध्याय का उद्देश्य है:
    • स्वतंत्रता के समय भारत की आर्थिक स्थिति को समझना
    • उन समस्याओं को जानना जो भारत को विरासत में मिलीं
  8. यही कारण था कि स्वतंत्र भारत ने योजनाबद्ध आर्थिक विकास को अपनाया।

औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत आर्थिक विकास का निम्न स्तर

(LOW LEVEL OF ECONOMIC DEVELOPMENT UNDER COLONIAL RULE)

  1. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का आर्थिक विकास बहुत धीमा था।
  2. विकास का लाभ भारतीयों को नहीं बल्कि ब्रिटेन को मिला।
  3. अंग्रेजों की नीतियों का मुख्य उद्देश्य था:
    • भारत से कच्चा माल प्राप्त करना
    • भारत में ब्रिटिश निर्मित वस्तुएँ बेचना
  4. भारत को केवल एक:
    • कच्चे माल का उत्पादक
    • तैयार माल का उपभोक्ता बना दिया गया।
  5. भारत की आय का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
  6. इसे धन की निकासी (Drain of Wealth) कहा जाता है।
  7. सरकार ने शिक्षा, उद्योग और स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च किया।
  8. परिणामस्वरूप:
    • प्रति व्यक्ति आय बहुत कम रही
    • गरीबी व्यापक रूप से फैली
  9. आर्थिक आत्मनिर्भरता का पूर्ण अभाव था।
  10. भारत एक निर्भर और शोषित अर्थव्यवस्था बन गया।

कृषि क्षेत्र (AGRICULTURAL SECTOR)

कृषि का महत्व

  1. कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी।
  2. लगभग 70–75% जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी।
  3. इसके बावजूद कृषि क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा हुआ था।

भूमि राजस्व प्रणालियाँ

अंग्रेजों ने तीन प्रमुख भूमि व्यवस्था प्रणालियाँ लागू कीं:

  1. जमींदारी प्रणाली
  2. रैयतवाड़ी प्रणाली
  3. महालवाड़ी प्रणाली

जमींदारी प्रणाली

  1. जमींदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया।
  2. किसान केवल किरायेदार बनकर रह गए।
  3. जमींदार किसानों से अत्यधिक लगान वसूलते थे।
  4. भूमि सुधार में उनकी कोई रुचि नहीं थी।
  5. किसानों का शोषण हुआ और वे कर्ज में डूबते गए।

कृषि की समस्याएँ

  1. निम्न उत्पादकता
    • पुराने औजारों का प्रयोग
    • आधुनिक तकनीक का अभाव
  2. मानसून पर निर्भरता
  3. सिंचाई सुविधाओं की कमी
  4. भूमि का विखंडन
  5. किसानों की ऋणग्रस्तता
  6. बार-बार अकाल
  7. व्यावसायीकरण
    • नील, कपास, चाय जैसी फसलों को बढ़ावा
    • खाद्यान्न उत्पादन की उपेक्षा
  8. कृषि अनुसंधान और निवेश का अभाव

प्रभाव

  1. ग्रामीण गरीबी बढ़ी।
  2. कृषि उद्योगों को कच्चा माल देने में असफल रही।
  3. खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ।

औद्योगिक क्षेत्र (INDUSTRIAL SECTOR)

पारंपरिक उद्योगों का पतन

  1. भारत में हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग विकसित थे।
  2. अंग्रेजों ने इन उद्योगों को नष्ट कर दिया।
  3. ब्रिटेन से सस्ते मशीन-निर्मित माल का आयात हुआ।
  4. भारतीय कारीगर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए।
  5. इस प्रक्रिया को औद्योगिक अवनति (Deindustrialisation) कहा जाता है।

आधुनिक उद्योगों का विकास

  1. कुछ आधुनिक उद्योग विकसित किए गए:
    • कपड़ा उद्योग
    • जूट उद्योग
    • लौह एवं इस्पात उद्योग
  2. ये उद्योग ब्रिटिश हितों के लिए थे।
  3. औद्योगिक विकास:
    • सीमित
    • असंतुलित
    • क्षेत्रीय था

पूंजीगत वस्तु उद्योगों का अभाव

  1. भारी उद्योगों का विकास नहीं हुआ।
  2. मशीनरी और उपकरण ब्रिटेन से आयात किए जाते थे।
  3. आत्मनिर्भर औद्योगिक विकास संभव नहीं था।

अन्य समस्याएँ

  1. कुशल श्रमिकों की कमी
  2. तकनीकी शिक्षा का अभाव
  3. सरकारी संरक्षण का अभाव
  4. उद्योग कुछ ही शहरों तक सीमित रहे:
    • मुंबई
    • कोलकाता
    • चेन्नई

विदेशी व्यापार (FOREIGN TRADE)

विदेशी व्यापार की प्रकृति

  1. विदेशी व्यापार पर अंग्रेजों का पूर्ण नियंत्रण था।
  2. भारत निर्यात करता था:
    • कच्चा माल
    • कृषि उत्पाद
  3. भारत आयात करता था:
    • तैयार वस्तुएँ
    • मशीनें

व्यापार संरचना

  1. निर्यात अधिशेष (Export Surplus) था।
  2. परंतु लाभ भारत को नहीं मिला।
  3. निर्यात से प्राप्त धन का उपयोग:
    • ब्रिटिश प्रशासन
    • युद्ध खर्च
    • होम चार्जेज में किया गया।

व्यापारिक साझेदार

  1. ब्रिटेन प्रमुख व्यापारिक साझेदार था।
  2. व्यापार का विविधीकरण नहीं था।

प्रभाव

  1. घरेलू उद्योग कमजोर हुए।
  2. आर्थिक शोषण बढ़ा।
  3. भारत की निर्भरता बढ़ी।

जनसांख्यिकीय स्थिति (DEMOGRAPHIC CONDITION)

जनसंख्या

  1. जनसंख्या बहुत अधिक थी।
  2. वृद्धि दर कम लेकिन दबाव अधिक था।

साक्षरता

  1. साक्षरता दर लगभग 16% थी।
  2. महिला साक्षरता अत्यंत कम थी।
  3. शिक्षा केवल कुछ वर्गों तक सीमित थी।

स्वास्थ्य

  1. खराब स्वास्थ्य सुविधाएँ
  2. बीमारियाँ:
    • मलेरिया
    • हैजा
    • प्लेग
  3. जीवन प्रत्याशा लगभग 32 वर्ष थी।
  4. शिशु मृत्यु दर अधिक थी।

गरीबी

  1. व्यापक गरीबी व्याप्त थी।
  2. जीवन स्तर अत्यंत निम्न था।

व्यावसायिक संरचना (OCCUPATIONAL STRUCTURE)

  1. कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक क्षेत्र में था।
  2. वितरण:
    • प्राथमिक क्षेत्र – 75%
    • द्वितीयक क्षेत्र – 10%
    • तृतीयक क्षेत्र – 15%
  3. इससे औद्योगिक पिछड़ापन स्पष्ट होता है।
  4. छिपी हुई बेरोजगारी व्यापक थी।
  5. रोजगार के सीमित अवसर थे।

अवसंरचना (INFRASTRUCTURE)

परिवहन

  1. सड़कें अविकसित थीं।
  2. रेलवे का विकास:
    • कच्चा माल ढोने
    • सैन्य नियंत्रण के लिए किया गया।

संचार

  1. डाक और तार सेवाएँ थीं।
  2. प्रशासनिक सुविधा हेतु उपयोग किया गया।

ऊर्जा

  1. बिजली उत्पादन बहुत कम था।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली नहीं थी।

जल और स्वच्छता

  1. स्वच्छ पेयजल की कमी
  2. खराब स्वच्छता व्यवस्था

उद्देश्य

  1. अवसंरचना का विकास ब्रिटिश हितों के लिए था।
  2. भारतीय आर्थिक विकास इसका लक्ष्य नहीं था।

निष्कर्ष (CONCLUSION)

  1. स्वतंत्रता के समय भारत को एक:
    • पिछड़ी
    • गरीब
    • अशिक्षित अर्थव्यवस्था विरासत में मिली।
  2. औपनिवेशिक शासन ने भारत की संपत्ति का शोषण किया।
  3. कृषि और उद्योग दोनों पिछड़े हुए थे।
  4. विदेशी व्यापार शोषणकारी था।
  5. अवसंरचना विकास असंतुलित था।
  6. रोजगार संरचना अस्वस्थ थी।
  7. इन परिस्थितियों ने आर्थिक योजना की आवश्यकता को जन्म दिया।
  8. स्वतंत्र भारत ने अपनाया:
    • पंचवर्षीय योजनाएँ
    • सार्वजनिक क्षेत्र
    • औद्योगीकरण
  9. इस अध्याय से भारत की विकास नीति की पृष्ठभूमि समझ में आती है।

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