सूरजप्रकाश की कहानी : भक्तिन
प्रस्तावना
हिंदी साहित्य में जिन रचनाकारों ने समाज के दबे-कुचले, हाशिए पर पड़े हुए वर्गों को स्वर दिया है, उनमें सूरजप्रकाश का नाम उल्लेखनीय है। उनकी कहानी “भक्तिन” केवल एक स्त्री के संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि भारतीय ग्रामीण समाज में व्याप्त जातिगत अन्याय, वर्गीय असमानता, स्त्री-दलित शोषण और धार्मिक पाखंड का सजीव चित्रण है। यह कहानी महज़ किसी पात्र की कथा नहीं, बल्कि उस पूरे समाज का दर्पण है, जहाँ गरीब, दलित और स्त्रियाँ एक साथ कई स्तरों पर शोषित होती रही हैं।
“भक्तिन” शीर्षक में ही निहित है कि यह कथा उस स्त्री की है, जिसे समाज ने नाम से नहीं, बल्कि उसकी जाति व स्थिति से पहचाना। उसका अस्तित्व किसी व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि जातिगत पहचान तक सीमित कर दिया गया। यही कारण है कि यह कहानी न केवल साहित्यिक दृष्टि से, बल्कि समाजशास्त्रीय, नारीवादी और दलित विमर्श के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कहानी का सारांश
कहानी का केन्द्र एक गरीब स्त्री भक्तिन है। वह मंदिर में साफ-सफाई का काम करती है और उसी से अपने जीवन-निर्वाह का प्रयास करती है। उसका जीवन गरीबी, उपेक्षा और सामाजिक भेदभाव से भरा हुआ है। भक्तिन सुबह से शाम तक मंदिर में पूजा-पाठ के लिए जगह तैयार करती है, प्रसाद बांटती है, झाड़ू-पोंछा करती है और देवता के सामने नतमस्तक रहती है।
लेकिन समाज उसे केवल ‘भक्तिन’ कहकर पुकारता है। उसका कोई व्यक्तिगत नाम, पहचान या अस्तित्व मानो है ही नहीं। उसका बेटा या परिवार भी उसकी गरीबी और बेबसी के कारण उसे सम्मान नहीं दे पाता। मंदिर का पुजारी और अन्य लोग उसकी मेहनत का शोषण करते हैं, लेकिन उसे कभी बराबरी का दर्जा नहीं मिलता।
इस कहानी में भक्तिन की गरीबी, जातिगत भेदभाव, धार्मिक पाखंड, और स्त्री होने के कारण होने वाले दोहरे शोषण का चित्रण है। वह जीवन भर मंदिर में भगवान की सेवा करती है, लेकिन अंततः उसे भगवान या समाज से न्याय नहीं मिलता।
सामाजिक पृष्ठभूमि
इस कहानी की पृष्ठभूमि भारतीय ग्रामीण समाज है, जहाँ धर्म और जाति का गहरा प्रभाव है।
- मंदिर समाज का केन्द्र है, लेकिन वहीं सबसे ज्यादा जातिगत भेदभाव और पाखंड भी है।
- दलित और गरीब वर्ग मंदिर में केवल सेवक या उपासक बनकर रह जाते हैं, उन्हें अधिकार या सम्मान नहीं मिलता।
- स्त्रियाँ तो और भी दयनीय स्थिति में हैं। उन्हें घर, समाज और धर्म – तीनों स्तरों पर शोषण सहना पड़ता है।
“भक्तिन” इसी पृष्ठभूमि से उभरती आवाज़ है।
पात्र-चित्रण
1. भक्तिन
कहानी की मुख्य पात्र। वह मेहनती, ईमानदार और श्रद्धालु है, लेकिन समाज की उपेक्षा और पाखंड की शिकार। उसका चरित्र एक साथ नारी, दलित और गरीब वर्ग की पीड़ा को समेटे हुए है।
2. पुजारी
मंदिर का प्रतिनिधि। वह धर्म के नाम पर सत्ता और वर्चस्व कायम रखता है। भक्तिन का शोषण करता है, लेकिन स्वयं को धर्म का संरक्षक कहता है।
3. भक्तिन का परिवार
उसके बेटे और घरवाले भी उसकी मजबूरी और बेबसी को देखकर उसकी उपेक्षा करते हैं। यहाँ लेखक यह दिखाते हैं कि गरीबी और जातिगत बेड़ियाँ परिवारिक रिश्तों को भी कमजोर कर देती हैं।
मुख्य विषय-वस्तु और संदेश
🔹 गरीबी की त्रासदी – भक्तिन रोज मेहनत करती है, पर उसका जीवन कभी सुखी नहीं होता।
🔹 जातिगत भेदभाव – दलित स्त्री होने के कारण वह सम्मान से वंचित है।
🔹 स्त्री की दोहरी पीड़ा – स्त्री होने के नाते वह शारीरिक, मानसिक और सामाजिक अन्याय सहती है।
🔹 धार्मिक पाखंड – मंदिर और भगवान की सेवा करने वाली भक्तिन को कभी समान अधिकार नहीं मिलता।
🔹 अस्तित्व की खोज – भक्तिन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसका व्यक्तिगत नाम और पहचान मिट चुकी है।
प्रतीकात्मकता
कहानी में प्रयुक्त तत्व गहरी प्रतीकात्मकता लिए हुए हैं:
✨ मंदिर – धार्मिक वर्चस्व और सामाजिक असमानता का प्रतीक।
✨ भक्तिन – दलित स्त्री की पीड़ा और संघर्ष की प्रतिमूर्ति।
✨ झाड़ू-पोंछा – समाज द्वारा थोपे गए निम्न श्रम का संकेत।
✨ भगवान – मौन और अन्यायपूर्ण सत्ता का प्रतीक।
नारी विमर्श
भक्तिन का चरित्र हमें यह दिखाता है कि भारतीय समाज में स्त्री की पहचान उसके श्रम या रिश्तों से नहीं, बल्कि जाति और स्थिति से तय होती है। वह परिवार, समाज और धर्म—तीनों स्तरों पर शोषित है। यह स्त्री केवल सहनशील नहीं, बल्कि प्रश्नचिह्न है कि आखिर स्त्री की पहचान क्यों छीन ली जाती है?
दलित विमर्श
इस कहानी का सबसे बड़ा पक्ष है – दलित स्त्री का चित्रण।
- वह दलित भी है और स्त्री भी, इसलिए शोषण दोहरा है।
- मंदिर में सेवा करने पर भी उसे सम्मान नहीं।
- उसका नाम मिटा दिया गया और केवल “भक्तिन” बना दिया गया।
यह कहानी दलित साहित्य की परंपरा में गहरे अर्थ रखती है।
भाषा और शिल्प
सूरजप्रकाश की भाषा सरल, सहज और मार्मिक है।
- लोक जीवन से जुड़े शब्द, जो कथा को यथार्थवादी बनाते हैं।
- संवाद छोटे लेकिन प्रभावी।
- कहीं-कहीं व्यंग्यात्मक शैली, जो धर्म और समाज की पोल खोल देती है।
- सबसे बड़ी विशेषता है – यथार्थ का सीधा और तीखा चित्रण।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
“भक्तिन” केवल अपने समय की कथा नहीं है। आज भी समाज में स्त्रियाँ, खासकर गरीब व दलित स्त्रियाँ, उसी प्रकार के शोषण का सामना करती हैं।
- आज भी मजदूर स्त्रियाँ नाम खो बैठती हैं, वे केवल “कामवाली”, “झाड़ूवाली” या “भक्तिन” बनकर रह जाती हैं।
- धर्म और राजनीति के गठजोड़ में गरीब वर्ग का शोषण अब भी जारी है।
- इसलिए यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी लिखे जाने के समय थी।
निष्कर्ष
सूरजप्रकाश की “भक्तिन” भारतीय समाज की उस कड़वी सच्चाई को सामने रखती है, जिसे अक्सर भुला दिया जाता है। यह केवल एक स्त्री की कथा नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग की आवाज़ है, जिसे हमेशा दबाया गया। यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि समाज कब तक किसी स्त्री या दलित को उसकी जाति, गरीबी या रिश्तों से पहचान देगा? कब उसे उसका अपना नाम और अस्तित्व मिलेगा?
